निवेश योजना

क्यों सरकार विदेशी बॉन्ड जारी करती है

क्यों सरकार विदेशी बॉन्ड जारी करती है
रमनदीप कौर का चित्रण | दिप्रिंट

क्यों सरकार विदेशी बॉन्ड जारी करती है

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चुनाव आयोग से पूछे बिना ही केंद्र ने खोल दी इलेक्टोरल बॉन्ड बिक्री की नई विंडो, फिर भी चुप क्यों हैं आयोग!

आखिर सरकार ने ऐसा क्यों किया जबकि अक्टूबर माह की बिक्री हुए ज्यादा दिन नहीं हुए थे। यह एक रहस्य है। इससे भी बड़ा रहस्य है कि इन बॉन्ड की बिक्री तब खोली गई जब हिमाचल प्रदेश और गुजरात दोनों राज्यों में आदर्श चुनावी आचार संहिता लागू है।

सांकेतिक फोटो

नवजीवन डेस्क

चुनावी बॉन्ड पर चुनाव आयोग की रहस्यमयी खामोशी न तो चौंकाती है और न ही इस पर चर्चा हो रही है। लेकिन केंद्र सरकार ने अभी जब 7 नवंबर को एक आदेश जारी कर इलेक्टोरल बॉन्ड की बिक्री की नई खिड़की खोल दी, वह भी ऐसे वक्त में जब दो राज्यों में चुनाव हो रहे हैं, तो सवाल तो उठना ही चाहिए।

हालांकि इससे पहले चुनाव आयोग पूर्व में कई मौकों पर इन बॉन्ड को लेकर अपनी आशंकाएं जता चुका है। 2017 से 2020 के बीच आयोग ने केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट दोनों के ही सामने कहा कि यह एक ऐसी व्यवस्था है जो कालेधन और शेल कंपनियों (ऐसी कंपनियां जो सिर्फ नाम का कारोबार कर पैसे को इधर-उधर करती हैं) को चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने का मौका देगी। लेकिन अब लगता है कि चुनाव आयोग भी लाइन में आ गया है और तमाम संस्थाओं की तरह ही सिर्फ मूक दर्शक बन कर सरकार के कदमों और फैसलों को देख भर रहा है। इसके बावजूद जब इस महीने की शुरुआत में केंद्र ने दुस्साहसी और बेशर्म तरीके से इलेक्टोरल बॉन्ड की बिक्री की नई तारीखें तय कीं क्यों सरकार विदेशी बॉन्ड जारी करती है तो आयोग से कम से कम प्रतिरोध दिखाने की उम्मीद की गई थी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।

सरकार ने 7 नवंबर को जो अधिसूचना जारी की कि उसके लिए उसने 2018 की अधिसूचना में संशोधन किया जिसमें एक साल में अधिकतम चार बार ही इलेक्टोरल बॉन्ड (जनवरी, अप्रैल, जुलाई और अक्टूबर में हर माह 10 दिन के लिए) की बिक्री का नियम था। इस दौरान स्टेट बैंक की चुनी क्यों सरकार विदेशी बॉन्ड जारी करती है हुई शाखाएं इन बॉन्ड की बिक्री कर सकती थीं। लेकिन अचानक से सरकार ने इस बार ऐन चुनावों के बीच 9 से 15 नवंबर तक के लिए फिर से यानी पांचवीं बार बॉन्ड बिक्री की अधिसूचना जारी कर दी।

सवाल है कि आखिर सरकार ने ऐसा क्यों किया जबकि अक्टूबर माह की बिक्री हुए ज्यादा दिन नहीं हुए थे। यह एक रहस्य है। इससे भी बड़ा रहस्य है कि इन बॉन्ड की बिक्री तब खोली गई जब हिमाचल प्रदेश और गुजरात दोनों राज्यों में आदर्श चुनावी आचार संहिता लागू है। वैसे तो इसे आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन माना जाना चाहिए, क्योंकि हिमाचल प्रदेश में 12 नवंबर को मतदान था और गुजरात में पहली और पांच दिसंबर को दो चरणों में मतदान होना है। सरकार के इस कदम को लेकर चुनाव आयोग से शिकायतें भी की गईं, लेकिन हुआ कुछ नहीं।

इसे लेकर पूर्व आइएएस और केंद्र सरकार में सचिव रहे ई ए एस सर्मा ने चुनाव आयोग को पत्र भी लिखा जिसमें रेखांकित किया गया कि ऐसे वक्त में जबकि इलेक्टोरल बॉन्ड का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है, सरकार द्वारा चुनावी मौसम में इनकी बिक्री को नियमों के विपरीत जाकर खोलना चौंकाता है। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट में इलेक्टोरल बॉन्ड को लेकर दाखिल याचिकाओं पर अभी हाल में सुनवाई हुई थी और अगली सुनवाई 6 दिसंबर को होनी है,। ऐसे में चुनाव आयोग की जिम्मेदारी थी कि वह इसका संज्ञान लेता। लेकिन तमाम अन्य मामलों की तरह चुनाव आयोग इस मुद्दे पर खामोश ही रहा।

ऐसा कोई संकेत भी नहीं है कि केंद्र सरकार ने आदर्श चुनाव संहिता लागू होने के दौरान ही इलेक्टोरल बॉन्ड की नई विंडो खोलने से पहले चुनाव आयोग की सलाह भी ली होगी। यह भी स्पष्ट नहीं है कि आखिर सरकार को इन बॉन्ड की बिक्री खोलने की जरूरत क्यों पड़ी। 9 नवंबर को खुली इस नई विंडो को हिमाचल चुनाव से तो नहीं जोड़ा जा सकता क्योंकि वहां तो 10 नवंबर को ही प्रचार खत्म हो चुका था और 12 नवंबर को मतदान भी हो गया। गौरतलब है कि विभिन्न स्त्रोतों से हासिल आंकड़े संकेत देते हैं कि चुनावी बॉन्ड के जरिए दिए जाने वाले चंदे का 98 फीसदी हिस्सा बीजेपी को ही मिलता है।

पिछले महीने जब सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई हो रही थी तो अटॉर्नी जरनल और सॉलिसिटर जनरल को कोर्ट के सामने यह बताने में पसीने छूट गए कि इलेक्टोरल बॉन्ड की व्यवस्था एकदम पारदर्शी है और ऐसी कोई गुंजाइश नहीं है कि शेल कंपनियां किसी भी तरह राजनीतिक दलों को कालेधन से चुनावी चंदा दे सकें। उम्मीद करें कि आने वाले वक्त में वह कोर्ट को यह भी बताएंगे कि किस तरह आयकर कानून (इनकम टैक्स ऐक्ट) और कंपनीज एक्ट में बदलाव कर यह व्यवस्था कर दी गई है कि किसी भ कंपनी को राजनीतिक चंदे का जिक्र अपने खातों में करने की जरूरत नहीं है।

लेकिन देश के नागरिकों को यह जानने का अधिकार है कि आखिर इन एक्ट में बदलाव क्यों किए गए, जिससे राजनीतिक दलों को विदेशी चंदा लेने की छूट मिल गई और क्यों कि पहले तीन साल में जो व्यवस्था लागू थी कि कोई भी कंपनी अपने मुनाफे के 7.5 फीसदी से अधिक चुनावी चंदा नहीं दे सकती, उसे क्यों खत्म कर दिया गया।

और, इससे भी बड़ा सवाल कि अगर सरकार पारदर्शिता में इतना ही विश्वास करती है तो उसे इलेक्टोरल बॉन्ड की जरूरत क्यों है? चंदा देने वाले तो चेक के जरिए या फिर डिजिटल ट्रांसफर के जरिए भी राजनीतिक पार्टियों को चंदा दे सकते हैं और पार्टियां चुनाव आयोग के सामने उनकी घोषणा भी कर सकती हैं।

वैसे एक आरटीआई के जरिए स्पष्ट हो चुका है कि केंद्र सरकार ने इलेक्टोरल बॉन्ड की नई विंडो खोलने से पहले चुनाव आयोग की सहमति की जरूरत ही नहीं महसूस की। इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक आरटीआई कार्यकर्ता कमोडोर लोकेश बत्रा ने इस बारे में एक आरटीआई आवेदन डाला था जिसके जवाब से सामने आया है कि सरकार के वित्त मंत्रालय ने इस बारे में पहली बार मार्च 2021 में चर्चा की थी और इसकी सिफारिश की थी। लेकिन इसकी अधिसूचना सिर्फ इस साल 7 नवंबर को ही जारी की गई।

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सरकारी बॉन्ड मार्केट को खुदरा निवेशकों के लिए खोलना अच्छी पहल, मगर इसे सफल बनाना भी जरूरी

खुदरा निवेशकों की सीधी भागीदारी के बाद पूरे बॉन्ड मार्केट को भी शामिल किया जाना चाहिए, और डेट प्रबंधन के काम को रिजर्व बैंक से अलग किया जाए.

रमनदीप कौर का चित्रण | दिप्रिंट

भारत ने सरकारी बॉन्ड मार्केट के द्वार खुदरा निवेशकों के लिए खोल दिए हैं ताकि सरकार की कर्जों की भारी जरूरत की खातिर पैसे जुटाने के लिए निवेशकों का आधार बढ़ाया जा सके. भारतीय रिजर्व बैंक ने इस साल फरवरी में अपने ‘स्टेटमेंट ऑन डेवलपमेंटल ऐंड रेगुलेटरी पॉलिसीज’ में घोषणा की थी कि वह खुदरा निवेशकों को ऑनलाइन सरकारी प्रतिभूति के प्राइमरी और सेकंडरी बाज़ारों में पहुंचने की अनुमति देगा. इसके साथ उन्हें रिजर्व बैंक में अपना सरकारी प्रतिभूति खाता (रिटेल डाइरेक्ट गिलट अकाउंट) खोलने और चलाने की सुविधा भी देगा.

यह स्वागतयोग्य कदम है क्योंकि यह खुदरा निवेशकों के लिए सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश करना और उनकी ट्रेडिंग करना अधिक आसान और सस्ता बनाएगा. अगला कदम एक स्वतंत्र पब्लिक डेट मैनेजमेंट एजेंसी (पीडीएमए) बनाने का होना चाहिए. इसके बाद सरकार और रिजर्व बैंक को बॉन्ड मार्केट रेगुलेशन और इन्फ्रास्ट्रक्चर को मुख्यधारा के वित्त बाज़ार और इन्फ्रास्ट्रक्चर से जोड़ने की कोशिश करनी चाहिए.

2016 में, नेशनल सिक्युरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड (एनएसडीएल) सर्विसेज़ और सेंट्रल डिपॉजिटरी सर्विसेज़ (इंडिया) लिमिटेड (सीएसडीएल) के डीमैट खाताधारकों को अपने डिपॉजिटरी भागीदारों के जरिए ‘एनडीएस-ओएम’ (निगोशिएटेड डीलिंग सिस्टम-ऑर्डर मैचिंग) प्लेटफॉर्म पर सरकारी प्रतिभूतियों की ट्रेडिंग करने की इजाजत दी गई थी. इन भागीदारों का सब्सिडियरी जनरल लेजर (एसजीएल) खाता होना चाहिए था. 2018 में, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ने अपने प्लेटफॉर्म पर प्राइमरी मार्केट में सरकारी बॉन्डों की खरीद की सुविधा दी थी.

लेकिन सेकेंडरी मार्केट में ट्रेडिंग और सेटलमेंट केवल रिजर्व बैंक द्वारा प्रबंधित इन्फ्रास्ट्रक्चर के जरिए ही संभव है. यह व्यवस्था सरकारी प्रतिभूतियों में सुगम ट्रेडिंग और निवेश की राह में रोड़ा डालती है.

बॉन्ड मार्केट का जुड़ाव

एक्सचेंज, क्लियरिंग हाउस और डिपॉजिटरी ही बॉन्ड मार्केट का इन्फ्रास्ट्रक्चर है. इन तीनों का प्रबंधन रिजर्व बैंक के हाथ में है. 1990 के दशक के शुरू में हर्षद मेहता घोटाले के बाद रिजर्व बैंक ने सरकारी प्रतिभूतियों की होल्डिंग के लिए इलेक्ट्रॉनिक लेजर की स्थापना की. ‘एसजीएल’ नामक यह लेजर सरकारी प्रतिभूति अधिनियम 2006 के तहत सरकारी प्रतिभूतियों की एकमात्र वैधानिक डिपॉजिटरी है. बैंक और वित्त संस्थान ‘एसजीएल’ के सदस्य होते हैं, जिनके खाते डिपॉजिटरी में होते हैं जिनमें वे सरकारी प्रतिभूतियों को जमा रखते हैं.

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वैधानिक फ्रेमवर्क ने रिजर्व बैंक को डिपॉजिटरी में भागीदारी की निगरानी, उसका प्रबंधन और नियमन करने का विशेष अधिकार दिया है. रिजर्व बैंक के पास ‘एनडीएस-ओएम’ सिस्टम है, जो सरकारी प्रतिभूतियों की ट्रेडिंग का केंद्र है. रिजर्व बैंक ने एक अनौपचारिक ‘क्लियरिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया’ (सीसीआइएल) के गठन की प्रक्रिया शुरू की जिसका स्वामित्व बैंकों के हाथ में होगा. इस तरह, बॉन्ड मार्केट के लिए एक समानांतर केंद्र—क्लियरिंग हाउस—डिपॉजिटरी बनता है. यह व्यवस्था मुख्यधारा के वित्त बाज़ार इन्फ्रास्ट्रक्चर से अलग कोठले के रूप में काम करती है.

अंतरराष्ट्रीय अनुभव बताता है कि बॉन्ड मार्केट इन्फ्रास्ट्रक्चर मुख्यधारा के वित्त बाज़ार इन्फ्रास्ट्रक्चर का ही एक हिस्सा होता है. अधिकतर देशों में सरकारी बॉन्डों की ट्रेडिंग शेयर बाज़ार द्वारा उपलब्ध कराए गए प्लेटफॉर्म पर होती है. सरकारी बॉन्डों के लिए डिपॉजिटरी इन्फ्रास्ट्रक्चर दूसरी प्रतिभूतियों के लिए संयुक्त इन्फ्रास्ट्रक्चर का हिस्सा होती है. प्रतिभूति बाज़ार का रेगुलेटर कुछ अपवादों को छोड़कर सरकारी प्रतिभूतियों के सेटलमेंट की निगरानी करता है. भारत एकमात्र देश है जहां बॉन्ड मार्केट इन्फ्रास्ट्रक्चर के तीनों तत्वों का स्वामित्व, नियंत्रण और प्रबंधन केंद्रीय बैंक के हाथ में है.

बॉन्ड बाज़ार का नियमन इसके बाज़ार इन्फ्रास्ट्रक्चर की तरह भारत के प्रतिभूति बाज़ार से अलग है. वैधानिक फ्रेमवर्क (खासकर आरबीआई एक्ट, 1934 और सरकारी प्रतिभूति अधिनियम, 2006) में संशोधन के जरिए बॉन्ड बाज़ार के नियमन अधिकार रिजर्व बैंक को दे दिए गए हैं. अधिकतर देशों में वित्त बाज़ार के एकीकृत रेगुलेटर ही सरकारी बॉन्ड बाज़ार के भी रेगुलेटर होते हैं.

भारत सरकार के प्रतिभूति बाज़ार में निवेशकों को ज्यादा भागीदारी के लिए प्रेरित करने वाली गहराई और तरलता का अभाव है. सेकेन्डरी मार्केट में कम ट्रेडिंग होती है. ज्यादा ट्रेडिंग कुछ ही प्रतिभूतियों और कुछ परिपक्व होने वाले ‘बकेट्स’ तक ही सीमित रहती है. बॉन्ड मार्केट इन्फ्रास्ट्रक्चर और प्रतिभूति बाज़ार इन्फ्रास्ट्रक्चर में सहज एकीकरण की कमी के चलते लागत बढ़ती है और खुदरा की व्यापक भागीदारी में बाधा पैदा होती है. हालांकि पिछले कुछ वर्षों में कई कदमों की घोषणा की गई है लेकिन अलग-अलग मार्केट इन्फ्रास्ट्रक्चर के कारण टकराव होता रहता है.

सरकारी प्रतिभूतियों के निर्गम और उनकी ट्रेडिंग को किसी अन्य प्रतिभूति की तरह खुदरा निवेशकों के डीमैट खाते में जारी करने की छूट देकर आसान बनाया जा सकता है. इससे सरकार को निवेशकों का व्यापक आधार बनाकर अपने उधार संबंधी कार्यक्रम को पूरा करने में मदद मिल सकती है.

रिजर्व बैंक के लिए चुनौती

फिलहाल रिजर्व बैंक के सामने चुनौती यह है कि सरकार के विशाल उधार कार्यक्रम को कम लागत में कैसे पूरा किया जाए. कच्चे तेल और जींसों की अंतरराष्ट्रीय कीमत में वृद्धि के कारण इनपुट लागत ऊंची हो रही है और इससे कीमतों में व्यापक वृद्धि हो सकती है. रिजर्व बैंक जब आर्थिक वृद्धि में फिर जान डालने पर ज़ोर दे रहा है, आर्थिक सुधार की गति और मांग में तेजी के कारण उसे ब्याज दरों में वृद्धि का रास्ता चुनना होगा.

बढ़ती दरें रिजर्व बैंक के लिए सरकार के उधार कार्यक्रम को पूरा करना चुनौतीपूर्ण बना देंगी. इस पृष्ठभूमि के साथ, निवेशकों का आधार व्यापक बनाने के लिए खुदरा निवेशकों के लिए अधिक छूट देना स्वागत योग्य कदम है.

निकट अतीत में, रिजर्व बैंक ने सरकारी बॉन्डों में विदेशी निवेशकों को अधिक हिस्सेदारी की छूट देकर निवेशकों का आधार व्यापक करने की कोशिश की थी. विदेशी निवेशकों द्वारा निवेश के लिए ‘पूरी तरह आसान रास्ता’ खोला गया, जिसके तहत कुछ विशेष प्रतिभूतियों को उनके लिए बेरोकटोक उपलब्ध कराया गया.

अब तक, अधिकांश सरकारी प्रतिभूतियां बैंकों के हाथ में हैं. कर्ज की मांग जब बढ़ रही है, बैंक के कब्जे में सरकारी बॉन्डों का अनुपात घट सकता है. जब सरकारी प्रतिभूतियां विविधतापूर्ण निवेशाक आधार के साथ अधिक बाज़ार-केन्द्रित हो रही हैं, डेट का प्रबंधन अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाएगा. तब सरकारी उधार कार्यक्रम को चलाने के लिए विशेष किस्म की एजेंसी की जरूरत होगी.

खुदरा की सीधी भागीदारी स्वागतयोग्य कदम है. इसके बाद एक ओर तो पूर्ण बॉन्ड बाज़ार का समावेश जरूरी है, दूसरी ओर डेट प्रबंधन को रिजर्व बैंक से अलग करने की जरूरत होगी. भारत को 10 ट्रिलियन डॉलर वाली अर्थव्यवस्था बनाने के लिए निर्णायक कदम होगा वित्त क्षेत्र में सुधार.

(इस ख़बर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

(इला पटनायक एक अर्थशास्त्री और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी में प्रोफेसर हैं. राधिका पांडे एनआईपीएफपी में सलाहकार हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)

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TV9 Bharatvarsh | Edited By: शशांक शेखर

Updated on: Apr 11, 2022 | 1:19 PM

बॉन्ड यील्ड (Bond Yield) में लगातार उछाल आ रहा है. 10 सालों का बॉन्ड यील्ड सोमवार को तीन साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया. सोमवार को यह 7.19 फीसदी के स्तर तक पहुंच गया था जो मई 2019 के बाद का उच्चतम स्तर है. शुक्रवार को यह 7.12 फीसदी के स्तर पर बंद हुआ था. रिजर्व बैंक (Reserve Bank of India) ने इंट्रेस्ट रेट में तो बढ़ोतरी नहीं की, लेकिन अब उसका फोकस ग्रोथ की जगह महंगाई पर है. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने शुक्रवार को कहा कि वह अब लूज मॉनिटरी पॉलिसी से दूर होगा. वह धीरे-धीरे सिस्टम से 8.5 लाख करोड़ की एक्सेस लिक्विडिटी को भी वापस लेगा. इसके अलावा स्टैंडर्ड डिपॉजिट फैसिलिटी का भी ऐलान किया गया. आरबीआई के इस रुख का असर बॉन्ड मार्केट पर दिख रहा है. इधर अमेरिका में बॉन्ड यील्ड में तेजी जारी है. इस समय यह 1.70 फीसदी की तेजी के साथ 2.76 फीसदी के स्तर पर है. यह मार्च 2019 के बाद का उच्चतम स्तर है.

बॉन्ड यील्ड इकोनॉमी की स्थिति के बारे में बताना वाला बड़ा संकेतक है. पहले जानते हैं कि बॉन्ड यील्ड होता क्या है. जब कोई बॉन्ड खरीदता है तो उसपर मिलने वाला रिटर्न फिक्स्ड होता है. बॉन्ज पर मिलने वाले इंट्रेस्ट रेट को कूपन रेट कहते हैं. उदाहरण के तौर पर आपने 1000 रुपए का बॉन्ड खरीदा जिसका कूपन रेट यानी मिलने वाला इंट्रेस्ट रेट 10 फीसदी है. एक साल में इस बॉन्ड से 100 रुपए इंट्रेस्ट के रूप में मिलेगा. सेकेंड्री मार्केट में उस बॉन्ड की आप ट्रेडिंग करते हैं. अगर बॉन्ड की डिमांड घट जाती तो यह 800 में बिकेगा. 800 में खरीदने वाले निवेशक के लिए भी एक साल में रिटर्न 100 मिलेगा. ऐसे में उसका नेट रिटर्न 12.5 फीसदी होगा. 12.5 फीसदी को यील्ड कहते हैं.

यील्ड बढ़ने का मतलब बॉन्ड की कीमत घट रही है

इस उदाहरण के साफ पता चलता है कि बॉन्ड यील्ड बढ़ने का मतलब है कि बॉन्ड की मांग घट रही है जिसके कारण इसकी कीमत घट रही है. बॉन्ड यील्ड घटने का मतलब है कि बॉन्ड की मांग बढ़ रही है जिसके कारण इसकी कीमत में उछाल आ रहा है. अगर इकोनॉमी में मजबूती आ रही है तो बॉन्ड यील्ड बढ़ेगा. अगर महंगाई बढ़ रही है तो भी यील्ड बढ़ेगा.

महंगाई 16 महीने के उच्चतम स्तर पर रह सकती है

मंगलवार को मार्च महीने के लिए खुदरा महंगाई का डेटा आने वाला है. रॉयटर्स के सर्वे के मुताबिक, मार्च में महंगाई 16 महीने के उच्चतम स्तर 6.35 फीसदी पर रह सकती है. जनवरी और फरवरी में भी महंगाई का आंकड़ा 6 फीसदी के पार रहा था. इस तरह यह लगातार तीसरा महीना होगा जब महंगाई की दर रिजर्व बैंक के अपर लिमिट को क्रॉस करेगा. RBI ने महंगाई का रेंज 2-6 फीसदी के बीच रखा है.

यील्ड बढ़ने पर बाजार में कैसे करें निवेश?

बॉन्ड यील्ड बढ़ने पर शेयर बाजार के प्रति निवेशकों का इंट्रेस्ट घट जाता है. मॉर्गन स्टैनली का कहना है कि अगर ग्रोथ रेट में गिरावट आ रही है, महंगाई बढ़ रही है और यील्ड में उछाल आ रहा है तो निवेशकों को टेक्नोलॉजी, हेल्थकेयर और कंज्यूमर स्टेप्लस सेक्टर में निवेश करना चाहिए.

7.25 फीसदी पर यील्ड पहुंचने के बाद RBI देगा दखल

इधर निवेशकों की निगाह बढ़ते अमेरिकी बॉन्ड यील्ड पर है जो अभी तीन सालों के उच्चतम स्तर पर है. निवेशकों का मानना है कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व मॉनिटरी पॉलिसी को जल्द टाइट करेगा और इंट्रेस्ट रेट में बढ़ोतरी की जाएगी. बॉन्ड यील्ड सरकार के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि सरकार वित्त वर्ष 2022-23 में बाजार से 14.31 लाख करोड़ का कर्ज उठाने वाली है. ऐसे में सरकार बढ़ते यील्ड को किस तरह मैनेज करती है, इस पर निवेशकों की निगाहें क्यों सरकार विदेशी बॉन्ड जारी करती है हैं. ट्रेडर्स का मानना है कि अगर भारत में 10 सालों का बॉन्ड यील्ड 7.25 फीसदी के पार पहुंच जाता है तो रिजर्व बैंक दखलअंदाजी करेगा. उससे पहले रिजर्व बैंक खुद दूर रहना चाहेगा.

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