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बाजार विभक्तिकरण का महत्व

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Vipanan meaning in hindi | विपणन का अर्थ एवं परिभाषा, विपणन का महत्व और कार्य

हेल्लो दोस्तों स्वागत है आपका हमारे ब्लॉग online sujhav पर, आज हम जानेंगे " Vipanan meaning in hindi, विपणन का अर्थ एवं परिभाषा, विपणन का महत्व और विपणन के कार्य " | विपणन की पूरी जानकारी प्राप्त करने के लिए आर्टिकल पूरा पढिये |

जब से मानव ने अपनी आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का उत्पादन या निर्माण करना प्रारम्भ किया है तभी से विनिमय कार्य का श्रीगणेश हो गया था। मुद्रा के आविष्कार के बाद वही विनिमय कार्य मुद्रा के बाजार विभक्तिकरण का महत्व माध्यम से किया जाने लगा और विक्रय कार्य का जन्म हो गया है। विक्रम वर्ष में धीरे-धीरे जब उत्पाद के स्थान पर ग्राहक / उपभोक्ता का महत्व बढ़ने लगा तब विपणन त् बीजारोपण हो गया। वही बोज आज विपणन का वट वृक्ष बन गया है। प्रत्येक व्यावसायिक संस्था के जीवन में ही नहीं अपितु प्रत्येक गैरव्यावसायिक संस्था के जीवन में भी विपणन कार्य अपरिहार्य बन गया है। वस्तुत: आधुनिक युग विपणन युग बन चुका है।

आधुनिक युग के प्रत्येक मानव का जीवन विपणन से अछूता नहीं है। विपणन मानव जाति के प्रत्येक पहलू को प्रभावित करता है। प्रातःकाल से लेकर देर रात तक हम सभी के जीवन को विपणन क्रियाएँ प्रभावित करती है तथा हम भी विपणन क्रियाओं को प्रभावित करते हैं। प्रात काल उठते ही हम किसी नामी कम्पनी के द्वारा निर्मित टूथपेस्ट से दाँतों को साफ कर सकते हैं, रेजर-ब्लेड से दाढ़ी बना सकते है, किसी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की कम्पनी द्वारा निर्मित साबुन, शैम्पू, तेल, क्रीम आदि का उपयोग करके नहा-धो सकते है, किसी ख्याति प्राप्त कम्पनी द्वारा निर्मित वस्त्रों एवं जो को धारण कर सकते हैं, माइक्रोवेव ओवन में तैयार नाश्ता प्राप्त कर सकते हैं तथा आधुनिक संयंत्र में बनी चाय-कॉफी पी सकते हैं और साथ में विश्वस्तरीय समाचार पत्र में समाचार पढ़ सकते हैं या टीवी चैनल पर समाचार देख-सुन सकते हैं शानदार एवं आरामदायक कार में बैठकर काम पर जा सकते हैं और अन्तर्राष्ट्रीय प्रमापों के अनुरूप अपना दिन भर का कार्य सम्पन्न कर घर लौटकर शानदार -शाम गुजार सकते हैं। इन सभी में प्रभावकारी विपणन की महत्त्वपूर्ण भूमिका है।

Vipanan (विपणन) meaning in hindi

Vipanan meaning in hindi
Vipanan meaning in hindi

विपणन : अर्थ एवं परिभाषाएँ

Vipanan meaning in hindi को अनेक तरीकों से परिभाषित किया गया है। कुछ ने इसे एक ऐसी मानवीय के रूप में परिभाषित किया है जिसका उद्देश्य मूल्य के बदले उत्पादों के विनिमय से ग्राहकों क सन्तुष्ट करना है।

कुछ अन्य विद्वानों ने इसे एक ऐसी क्रिया के राज्य में परिभाषित किया है जिसके द्वारा उत्प में विभिन्न प्रकार की उपयोगिताओं (Utilities) सृजन किया जाता है। कुछ और अन्य विद्वानों इसे एक ऐसी क्रिया के रूप में परिभाषित किया है जो समाज को उच्च जीवन-स्तर प्रथ "belivery of standard of living) करती है।

ये सभी परिभाषाएँ विपणन को पूर्णतः व्यापक अर्थ प्रदान नहीं कर पाती है। अतः विप क्षेत्र के कुछ विद्वानों ने विपणन शब्द को व्यापक अर्थ के रूप में परिभाषित किया है। उनमें से प्रमुख परिभाषाएँ यहाँ नीचे दी जा रही हैं :

फिलिप कोटलर (Philip Kotler) के अनुसार, "विपणन एक सामाजिक प्रबन्धकीय प्रक्रिया है जिसके द्वारा लोग एवं लोगों के समूह उत्पादों का सृजन कर मूल्य के बदले धिनिमय कर उन्हें प्राप्त करते हैं, जिनकी उन्हें आवश्यकता एवं इच्छा है।'

की परिभाषा समिति ने पहली बार 1960 में विपणन शब्द को परिभाषित किया था। उसके बाद भी इस समिति ने इस शब्द की कई नई परिभाषाएँ स्वीकार की गई है। सन् 2004 और 2007 में भी इस परिभाषा समिति ने नई परिभाषा अपनाई थी जो निम्नानुसार है:

अमेरिकन मार्केटिंग एसोसिएशन (AMA, 2004) के अनुसार, "विपणन एक संगठनात्मक कार्य एवं प्रक्रियाओं का समूह है, जिनका उपयोग ग्राहकों के लिए उपयोगी उत्पादों के सृजन, संचारण एवं प्रदत्त करने तथा ग्राहक सम्बन्धों के प्रबन्धन में इस प्रकार किया जाता है ताकि संगठन तथा उसके हितधारी (stakeholders) लाभान्वित हो सके।

निष्कर्ष : इस प्रकार विपणन एक ऐसी सामाजिक एवं प्रबन्धकीय प्रक्रिया है जो मानवीय आवश्यकताओं एवं इच्छाओं को सन्तुष्ट करने वाले उत्पादों/सेवाओं के सृजन, संवर्द्धन, वितरण और विनिमय करने तथा सम्पूर्ण समाज तथा संगठनात्मक हित में ग्राहक सम्बन्धों को चिरस्थायी बनाए रखने में योगदान देती है।

बाजार विभक्तिकरण एवं विपणन रीति-नीति पर एक विस्तृत लेख लिखिये।

किसी वस्तु के सभी क्रेता एक से नहीं होते हैं इसलिए एक विक्रेता अपनी विपणन रणनीति में अन्तर कर सकता है। यह अन्तर बाजार खण्ड के आधार पर हो सकता है। इस सम्बन्ध में निम्न तीन में से कोई भी रीति अपनायी जा सकती है

(1) भेदभावहीन विपणन रीति-नीति-इस नीति को अपनाने वाली संस्थाएँ विभिन्न ग्राहकों में अन्तर नहीं करती हैं और अपना एक ही विपणन कार्यक्रम अपनाती है। इसका अर्थ यह है कि निर्माता के द्वारा केवल एक ही प्रकार की वस्तु का निर्माण एवं विक्रय किया जाता है। इसमें इस बात का अधिक ध्यान रखा जाता है कि ग्राहकों में किन-किन बातों में समानताएँ पायी जाती हैं। इसीलिए विज्ञापन अपीलें वैसी ही बनायी जाती हैं जिनसे अधिकांश ग्राहकों की समानता का पता चलता हो।

उदाहरण के लिए, कोका-कोला (पेय पदार्थ) बनाने वाली कम्पनी कई वर्षों से एक ही पेय पदार्थ बना रही है जोकि एक ही आकार वाली बोतल व स्वाद में मिलता है। इस प्रकार की रीति-नीति अपना में संस्था विभिन्न माँग वक्रॉ पर ध्यान न देकर सम्पूर्ण बाजार को एक ही रूप में मानकर चलती हैं। इसमें ग्राहकों की समान विशेषताओं पर ध्यान दिया जाता है और वस्तु ऐसी बनायी जाती है कि सभी ग्राहकों को अच्छी लगे। भारत में अधिकांश निर्माता इसी नीति को अपनाते हैं क्योंकि ऐसा करने से

(i) उत्पादन लागत कम रहती है क्योंकि एक ही वस्तु का निर्माण किया जाता है। (ii) विज्ञापन लागत भी कम रहती है।

(iii) संग्रह लागत घटती है क्योंकि एक ही प्रकार की वस्तु का उत्पादन होता है उसी का विज्ञापन होता है और उसको ही कम मात्रा में संग्रहित किया जाता है।

(iv) परिवहन लागत कम रहती है।

(v) विपणन अनुसन्धान लागत भी कम रहती है।

(iv) साथ ही संस्था के सामान्य प्रबन्ध व्यय भी कम रहते हैं।

निष्कर्ष- एक निर्माता प्रारम्भ में इस नीति को अपनाता है लेकिन जैसे-जैसे प्रतियोगिता बढ़ती जाती है निर्माता इस नीति से हटने के लिए बाध्य हो जाते हैं।

(2) भेदभावपूर्ण विपणन रीति-नीति इस रीति-नीति को अपनाने वाली संस्थाएँ एक वस्तु का निर्माण नहीं करतीं बल्कि इस वस्तु के विभिन्न बाजार विभक्तों को ध्यान में रखकर कई वस्तुओं का निर्माण करती हैं और कई विपणन रीति नीतियाँ अपनाती हैं। ऐसा करने का उद्देश्य अधिक बिक्री करना होता है जिससे लाभ अधिक हो सके तथा प्रत्येक प्रकार के बाजार तक पहुँच सके। इसका अर्थ यह है कि ऐसी नीति अपनाकर सभी प्रकार के ग्राहकों तक पहुँचा जा सकता है। भारत में इस प्रकार की नीति कुछ संस्थाएँ अपनाती हैं जैसे-गोल्डन टुबाको कम्पनी लिमिटेड विभिन्न नामों से सिगरेट बनाती है व बेचती हैं, जैसे- पनामा, न्यू डील, गोल्ड फ्लेक, ताज, सैनिक, गेलॉर्ड, ताजमहल, डायमण्ड, स्क्वायर, टार्जेट। इसी प्रकार हिन्दुस्तान लीवर लिमिटेड नामक कम्पनी भी कई नामों से नहाने के साबुन बनाती है व बेचती हैं, जैसे-लक्स, लाइफबॉय, रेक्सोना, लिरिल आदि।

निष्कर्ष इस प्रकार की नीति अपनाने में कुल बिक्री बढ़ती है और ग्राहकों को अपने इच्छा के अनुरूप वस्तु मिल जाती है लेकिन इससे प्रशासनिक लागत, उत्पादन लागत, संग्रह लागत, प्रवर्तन लागत व विक्रय लागत में वृद्धि होती है। यह रीति-नीति ग्राहक अभिमुखी है लेकिन यह सदा ही लाभ अभिमुखी हो ऐसा सम्भव नहीं है। इसका लाभ अभिमुखी होना। इस बात पर निर्भर करता है कि लागतों की तुलना में बिक्री किस बाजार विभक्तिकरण का महत्व अनुपात में बढ़ती है।

(3) केन्द्रित विपणन रीति-नीति-वे निर्माता जो सभी बाजारों में एक साथ पहुँचना पसन्द नहीं करते, वे इस केन्द्रित विपणन रीति नीति को अपनाते हैं। इसमें बाजार के किसी एक भाग पर सारी विपणन शक्ति केन्द्रित कर दी जाती है और उसी भाग के ग्राहकों को सन्तुष्ट करने का प्रयत्न किया जाता है। इस बाजार विभक्तिकरण का महत्व नीति को साधारणतया एक निर्माता द्वारा प्रारम्भ में ही अपनाया जाता है। यह नीति उन संस्थाओं के द्वारा भी अपनायी जा सकती है जिनके अन्तर्गत आर्थिक साधन सीमित होते हैं। इसी प्रकार यह नीति उस समय भी अपनायी जा सकती है जबकि वस्तु की विशेषताओं में काफी अन्तर हो या ग्राहकों के व्यवहारों में काफी अन्तर पाया जाता हो। भारत में इस प्रकार की बहुत-सी संस्थाएँ हैं जो इस नीति को अपनाती है। उदाहरण के लिए,

पुस्तक प्रकाशन का कार्य सभी विषयों एवं भाषाओं में किया जा सकता है लेकिन कुछ प्रकाशक किन्ही पब्लिकेशन, आगरा ने हिन्दी पाठ्यक्रम पुस्तकों के प्रकाशन में वाणिज्य व अर्थशास्त्र का क्षेत्र चुन लिया है। कही इस बाजार या विभक्तिकरण का चुनाव किसी प्रकार गलत हो गया तो संस्था का अस्तित्व ही खतरे निष्कर्ष- इस नीति को अपनाने में संस्था का भविष्य एक ही बाजार पर निर्भर रहता है। यदि में पड़ जाता है लेकिन उपयुक्त चुनाव होने पर लाभ भी अधिक होता है।

डॉ. रिचा जैन

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बी. कॉम. हेतु नवीन पाठ्यक्रमानुसार

विषय-सूची

1. विपणन बाजार विभक्तिकरण का महत्व विचारधारा … 1
परम्परागत एवं आधुनिक; विक्रय बनाम विपणन, विपणन का स्वभाव एवं क्षेत्र; विपणन का व्यापारिक कार्य बाजार विभक्तिकरण का महत्व बाजार विभक्तिकरण का महत्व के रूप में महत्व
Marketing Concept
Traditional and Modern; Selling V/S Marketing; Nature & Scope of Marketing; Importance Of Marketing As A Business Function)
2. विपणन-मिश्रण एवं विपणन-वातावरण . 20
Marketing-Mix And Marketing-Environment
3. उपभोक्ता व्यवहार …27
स्वभाव, क्षेत्र एवं महत्व
Consumer Behaviour :
Nature, Scope And Significance
4. बाजार विभक्तिकरण . 51
विचारधारा एवं महत्व, बाजार विभक्तिकरण के आधार
Market Segmentation
Concept And Importance, Bases for Market Segmentation
5. वस्तु . 60
वस्तु विचारधारा, उपभोक्ता एवं औद्योगिक वस्तु एवं वस्तु जीवन-चक्र विचारधारा
Product
Concept of Product, Consumer & Industrial Goods; and Product Life-Cycle Concept
6. वस्तु-नियोजन एवं विकास . 71
Product-Planning And Development
7. ब्राण्ड नाम एवं ट्रेडमार्क; पैकेजिंग-भूमिका एवं कार्य तथा विक्रय के बाद सेवा. 86
Brand Name and Trade Mark; Packaging-Role and Functions & After Sale Service
8. मूल्य : विपणन मिश्रण में मूल्य का महत्व एवं वस्तु/सेवा के मूल्य को प्रभावित करने वाले घटक तथा बट्टा एवं छूट . 108
Price : Importance of Price in Marketing Mix & Factors Affecting Price of A Product/Service and Discounts & Rebates
9. वितरण-माध्यम : विचारधारा एवं भूमिका, प्रकार तथा चुनाव को प्रभावित करने बाजार विभक्तिकरण का महत्व वाले घटक . 133
Distribution Channel : Concept and Role, Types and Factors Affecting Choice
10. थोक एवं फुटकर विक्रेता . 150
Wholesaler and Retailer
11. वस्तुओं का भौतिक वितरण: स्टाक नियन्त्रण एवं आदेश प्रोसेसिंग . 170
Physical Distribution of Goods: Inventory Control & Order Processing
12. परिवहन एवं भण्डारण … 181
Transportation and Warehousing
13. संवर्द्धन : संवर्द्धन के तरीके ; अनुकूलतम संवर्द्धन सम्मिश्रण . 188
Promotion : Methods Of Promotion; Optimum Promotion Mix
14. वैयक्तिक विक्रय … 195
Personal Selling
15. विज्ञापन माध्यम : सम्बन्धित गुण एवं सीमाएं तथा प्रभावी विज्ञापन की विशेषताएं . 205
Advertising Media : Their Relative Merits and Limitations and Characteristics of An Effective Advertisement
16. विक्रय संवर्द्धन एवं जन सम्पर्क तथा पब्लिसिटी . 236
Sales Promotion & Public बाजार विभक्तिकरण का महत्व Relations and Publicity
17. कृषि विपणन . 248
Agricultural Marketing
18. उपभोक्तावाद . 257
Consumerism
परिशिष्ट : वस्तुनिष्ठ प्रश्न

विपणन के सिद्धान्त एवं व्यवहार (Principles & Practice of Marketing)

विपणन के सिद्धान्त एवं व्यवहार Principles & Practice of Marketing पुस्तक का प्रस्तुत संस्करण ‘विपणन के सिद्धान्त एवं व्यवहार’ लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ के बी. काॅम. सेमेस्टर III हेतु निर्धारित पाठ्यक्रमानुसार प्रकाशित की गई है। पुस्तक में पाठ्यक्रम के सभी शीर्षकों की सरल भाषा में विस्तृत विवेचना की गई है।

विपणन के सिद्धान्त एवं व्यवहार Principles & Practice of Marketing Book विषय-सूची

विपणन के सिद्धान्त (Principles of Marketing)

प्रस्तुत पुस्तक विपणन के सिद्धान्त Principles of Marketing विभिन्न विश्वविद्यालयों द्वारा निर्धारित बी. कॉम. के विद्यार्थियों हेतु तैयार की गयी है I इस पुस्तक की विशेषता है कि यह न केवल पाठ्यक्रम के अनुसार है, बल्कि इसमें भारतीय उदाहरण देकर भाषा को रोचक एवं समझ के योग्य बना दिया गया है।

विपणन के सिद्धान्त Principles of Marketing Book विषय-सूची

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